कमसिन कली Hot Vasna Story


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कमसिन कली Hot Vasna Story

समय के साथ-साथ बच्चे बड़े होते जा रहे थे, जिनमें दो सौम्या और सुरभि तो विवाह योग्य हो चुकी थीं। इससे सत्यप्रकाश की चिंता दिनों दिन बढ़ती ही जा रही थी। इन सबके चलते सत्यप्रकाश ने शराब पीनी शुरू कर दी। इससे वो दिन-रात शराब के नशे में ही डूबा रहता था।
एक रात जब सत्यप्रकाश छत पर सोया था, तो नशे की हालत में छत से गिर गया। जिसके परिणाम स्वरूप उसके शरीर में कई जगहों पर फैक्चर हो गये और फिर वो बिस्तर से कभी उठ नहीं पाया था।

कुछ ही दिनों के बाद सत्यप्रकाश की मौत हो गई, जिससे उसका परिवार गरीबी की कगार में पहुंच गया। लेकिन शैलजा ने फिर भी हिम्मत नहीं हारी और खेती-बाड़ी का काम उसने स्वयं ही संभाल लिया।
सारा काम संभाल कर शैलजा ने कुछ पैसा जमा कर लिया, तो सुरभि और सौम्या के ब्याह की बात चलाने लगी।
शैलजा ने अपने कई रिश्तेदारों से भी अच्छा लड़का बताने के लिए कह दिया था। इस पर उसका साथ रिश्तेदारों ने भी दिया। उन्हीं में से अनिल मिश्रा भी था। वो रिश्ते में शैलजा का सगा चचेरा देवर लगता था।
सत्यप्रकाश के साथ अनिल मिश्रा का गहरा भाईचारा था, इसलिए उसकी मौत के बाद से अनिल, सत्यप्रकाश के परिवार का खास ध्यान रखता था। उनके सुख-दुख में पहले से पहले आता था।
अनिल ने सौम्या और सुरभि की शादी में खूब खर्चा कर किसी तरह की कमी नहीं होने दी।
शैलजा सहित उसका पूरा परिवार अनिल मिश्रा का एहसान मंद हो गया। अनिल जो कहता परिवार वाले उसकी सलाह पर सारा काम करते थे। नितिन अपने चाचा की हर बात को मानता था। उसने बारहवीं तक पढ़ने के बाद परिवार दयनीय हालात को देखकर आगे की पढ़ाई नहीं की और अपनी मां का खेती के काम में हाथ बंटाने लगा।
वक्त बीतने लगा…
अनिल मिश्रा का शैलजा के घर पर लगभग आये दिन ही आना-जाना होता था। नितिन और शैलजा तो सुबह ही खेत पर निकल जाते थे। घर पर स्वाति अकेली रह जाती थी।
उसके सूनेपन में जब भी अनिल घर पर आता, तो स्वाति अपनी मां को बुलाकर ले आती थी। शैलजा खेत का काम छोड़ कर घर चली आती और अनिल की मेहमान नवाजी और खातिरदारी में जुट जाती थी।
अनिल मिश्रा के आने पर स्वाति को खुशी होती थी वो अक्सर उससे कहती, ‘‘चाचा गांव मंे हर कोई तुम्हारे रौब को देखकर तुमसे डरता होगा?’’
‘‘अरे नहीं बिटिया! ऐसा नहीं है। अब क्या है न कि हम अपनी सुरक्षा के लिए इसे अपने साथ रखते हैं। क्योंकि तमाम दोस्त होते है तो दुश्मनों की कमी भी नहीं रहती है।’’
‘‘हां वो तो सही बात है। चाचा एक काम करो, तुम मुझे भी पिस्तौल चलाना सिखा दो और हां मोटरसाइकिल भी मुझे को आपसे सीखनी है।’’
‘‘चल-चल तू अपना काम कर। चाचा के पास फालतू वक्त नहीं है, कि वो तुझे ये सब सिखाने में बर्बाद कर दे।’’ तभी नितिन बोला, ‘‘क्यों चाचाजी मैंने ठीक कहा न?’’
अनिल ठहाका मारकर हंसने लगा, तो स्वाति रूठ गई, ‘‘चाचाजी आप हमेशा भैया का ही पक्ष लेते हैं। हमारी बात पर कभी ध्यान नहीं देते। हमने कहा न हमें सीखनी है तो बस सीखनी है। गांव में हमारा भी रूतबा रहेगा। नितिन भैया को भी डराते रहेंगे। ये हमें बहुत परेशान करते हैं।’’
स्वाति की बातें सुनकर सब लोग हंसने लगे।
‘‘मोटरसाकिल बाद में सीखना पहले चाचा के लिए खाना तो बनाने की तैयारी कर।’’ मां कहने लगी।
इसी तरह की खट्टी मीठी हंसी मजाक चलती रहती, तो शैलजा भी कुछ देर के लिए अपने गमों को भूल जाती थी।
लेकिन स्वाति की जिद्द कायम थी, वो लगातार अनिल से मोटरसाइकिल और रिवाॅल्वर सीखने की जिद्द करती रहती थी।
आखिरकार एक दिन जब अनिल घर आया, तो उसने आते ही स्वाति को आवाज देकर बाहर आने के लिए कहा। वो आई तो अनिल ने उससे कहा, ‘‘देखो आज हम ने मोटरसाइकिल की टंकी तेल से पूरी भर ली है। चलो तुमको आज मोटरसाइकिल चलाना सिखाते हैं।’’
ये सुनकर स्वाति खुशी से उछल पड़ी और झट से मोटरसाइकिल पर सवार हो गई। अनिल उसे गांव से दूर खुले मैदान में ले गया।
स्वाति ने पहली बार मोटरसाइकिल का हैंडिल थामा और कहने लगी, ‘‘चाचा जी ये तो बहुत भारी है। मेरे तो हाथ भी दर्द करने लगेंगे।’’
‘‘लो फिर तो सीख ली, अभी से यही सोचोगी तो कैसे सीख पाओगी? चलो आओ बैठो।’’
कहकर अनिल ने बाइक के दोनों हैंडिल छोड़ दिये और पीछे खिसक कर स्वाति को आगे बैठा लिया।
फिर स्वाति के दोनों पैर जमीन पर आसानी से जमे हुए थे। उसने अपने दोनों हाथ भी हैंडिल पर जमा दिये। उसके बाद मोटरसाइकिल स्टार्ट करने लगी, तो पहली ही ‘किक’ सफल रही। बाइक धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी। अनिल का बदन स्वाति के बदन से पूरी तरह से सटा हुआ था।
एकाएक अनिल को स्वाति के बदन का सुखद एहसास हुआ, तो वो बहकने लगा। चाहकर भी वह खुद को रोक नहीं पा रहा था। अनिल की सांसे तेज होने लगीं, तो उसने मोटरसाइकिल को रोक दिया और आहिस्ते से स्वाति की कमर में हाथ डाल दिया।

चाचा की इस हरकत से स्वाति को भी सुखद आनंद मिला और बदन में एक सिरसिरी-सी दौड़ गई। अनिल की समझ में आ गया, कि जो कुछ उसने किया उससे स्वाति को भी आनंद मिला है। अतः अनिल के हाथों की हरकतें और उग्र हुई तो स्वाति के कोमल रहस्यमयी अंगों में हलचल भरने लगा।
अनिल मिश्रा की हरकतों का स्वाति ने विरोध नहीं किया, बल्कि उसका साथ देकर बहकने लगी, तो अनिल ने कहा, ‘‘कैसा लग रहा है?’’

‘‘चाचा तुम कितने अच्छे हो। जो कर रहे हो, उसे जारी रखो।’’ स्वाति ने मस्ती में कहा।
‘‘यहां खुले में जो करूंगा, उससे दहशत भी बनी रहेगी, इसलिए किसी सूनी जगह पर सुख दूंगा।’’
अनिल के दिलो दिमाग में स्वाति अब उसकी भतीजी नहीं, बल्कि प्रेमिका के रूप में दिखाई दे रही थी।
एक दिन जब अनिल घर पर आया, तो हमेशा की तरह स्वाति अकेली थी। मगर इस बार उसके स्वभाव में अलगपन था। वह पहले से ज्यादा सजी-संवरी हुई थी और बात-बात पर शरमा जाती थी। अनिल भी सूने घर में खूबसूरत स्वाति को देखकर अंदर तक मचल उठा।
वह बोला, ‘‘क्या हुआ स्वाति दूर क्यों खड़ी हो?’’ वह उसके नजदीक जाकर बोला, ‘‘उस दिन का एहसास याद है या?’’ कहकर उसने स्वाति को बांहों में भर लिया और उसके गालों को सहलाने लगा, ‘‘अगर भूल भी गई हो, तो मैं तुम्हें पुनः उसका एहसास करा सकता हूं।’’
‘‘चाचा…!’’ कसमसाते हुए बोली स्वाति, ‘‘ओ चाचा…! छोड़िए न।’’
‘‘क्यों तुम्हें आज अच्छा नहीं लग रहा है।’’ अनिल उसके वस्त्रों के ऊपर से ही उसके नाजुक ‘सेबों’ को सहलाते हुए बोला, ‘‘उस रोज तो बहुत मजा ले…।’’
‘‘धत्त…!’’ शरमाते हुए एकाएक अनिल की बांहों से छिटक कर अलग होते हुए बोली स्वाति, ‘‘ऐसी बात नहीं है।’’ वह हौले से बोली, ‘‘दरवाजा!’’ उसने दरवाजे की ओर इशारा किया, ‘‘दरवाजा खुला है।’’
‘‘ओह तो ये बात है।’’ मुस्कराते हुए बोला अनिल, ‘‘अभी बंद किए देते हैं।’’ कहकर अनिल ने तपाक से घर का दरवाजा बंद किया और कुण्डी लगा ली।

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फिर वह पुनः स्वाति के पास आ गया और उसके होंठों को चूमते हुए बोला, ‘‘अब तो कोई परेशानी नहीं है न?’’
स्वाति कुछ न बोली और उसने शरमाते हुए अपना सिर अनिल के कंधे पर टिका दिया। अनिल उसकी मूक सहमति समझ गया और उसे गोद में उठाकर पलंग पर ले गया।
इससे पहले कि वह आगे कुछ करता, तभी स्वाति हौले से बोली, ‘‘चाचा, उस दिन तो मजा दिया था, उसे आज मैं पूरी तरह पा लेना चाहती हूं।’’ उसके स्वर में मदहोशी थी, ‘‘बहुत मजा आ रहा था जब तुम मेरे यहां-वहां हाथ…।’’
इसके आगे कुछ न कह पाई स्वाति और शर्म से मुंह परे कर लिया।
तभी अनिल, स्वाति का कुर्ता ऊपर सरकाते हुए बोला, ‘‘अगर पूरा मजा पाना चाहती हो, पहले अपने सभी वस्त्रा…।’’
‘‘हाय… हाय! नहीं।’’ अभी अनिल अपनी बात पूरी कर पाता, उससे पहले ही बोल पड़ी स्वाति, ‘‘मुझे शर्म आयेगी।’’
‘‘शर्म कैसी स्वाति?’’ उसके सबों को हौले से सहलाते हुए बोला अनिल, ‘‘जब जिस्म से जिस्म से मिलंेगे, तो आनंद ही आनंद होगा, शर्म का नामोनिशान ही मिट जायेगा।’’
कहकर अनिल ने धीरे-धीरे स्वाति को सर से पांव तक पूर्ण निर्वस्त्रा कर डाला। फिर स्वयं भी उसी अवस्था में आ गया। स्वाति के गोरे संगमरमरी निर्वस्त्रा देह को देखकर अनिल की लार टपकने लगी। उसने झट से स्वाति को पलंग पर चित्त लेटाया और दीवानों की तरह उसके बदन को जहां-तहां चूमने चाटने लगा, सहलाने लगा।

उसकी इस हरकत से स्वाति भी आंखें मूंदे मादक सिसकियां लेने लगी…
‘‘ओह चाचा…आनंद के साथ-साथ थोड़ी घबराहट भी हो रही है।’’ वह अनिल की आंखों में देखकर बोली, ‘‘यह देखो मेरी टांगे कैसे कांप रही है।‘‘
‘‘डरो नहीं पगली।’’ उसके पतले गुलाबी होंठों को चूमकर बोला अनिल, ‘‘आज तुम पहली कली से फूल बनने जा रही हो न…इसलिए। एक अनजानी सी कसक है तुम्हारे मन में। मगर तुम चिंता मत करो…ऐसे प्यार करूंगा, कि तू भी याद करेगी।’’
‘‘सच में चाचा।’’ अनिल से लिपटते हुए बोली स्वाति।
‘‘चुपकर स्वाति की बच्ची।’’ स्वाति के नाजुक होंठों पर अंगुलि रखते हुए बोला अनिल, ‘‘मुझसे मजा भी मांग रही है और चाचा भी कह रही है।’’ उसकी गोरी जांघों को सहलाते हुए बोला, ‘‘इस समय तो मैं तेरा आशिक और तू मेरी महबूबा है मबहूबा…क्या समझी?’’
‘‘सही कहा मेरे आशिक जी।’’ स्वाति भी प्रत्युत्तर मंे हंसकर बोली, ‘‘अपनी महबूबा को जीभर कर प्यार करो।’’
‘‘जो हुक्म मेरी खबूसूरत महबूबा।’’
फिर अनिल, स्वाति की अनछुई देह को यहां-वहां चूमने लगा और सहलाने लगा। स्वाति बुरी तरह मदहोश हुए जा रही थी। वह अनिल से लिपटी हुई कहने लगी, ‘‘अब जल्दी से उस एहसास का पूरा आनंद दे दो, जिसके बारे में मैंने अपनी सहेलियों से सिर्फ सुना है।’’ वह अनिल की पीठ पर नाखून चलाती हुई बोली, ‘‘हाय आशिक जी…वाकई इसमें तो बहुत मजा है। बढ़ो न आगे..’’
अनिल समझ गया कि लोहा गर्म है और हथौड़े की चोट मारने का उचित समय यही है।
फिर अनिल ने जैसे ही स्वाति की अनछुई अंधेरी ‘कोठरी’ में प्रवेश किया…स्वाति ऐसे चीखी कि जैसे किसी ने लोहे गर्म सलाख उसकी नाजुक देह के आर-पार कर दी हो।
वह अनिल को अपने ऊपर से हटाने के लिए अपने नाजुक हाथों से परे धकलने का प्रयास करने लगी…
‘‘ओह मां…मर गई..हटो चाचा।’’
‘‘पागल है क्या स्वाति तू।’’ स्वाति के मुंह को कसकर अपने हाथों से दबाते हुए बोला, ‘‘चीख क्यों रही है? और फिर तुझे कहा न इस वक्त चाचा मत बोल।
‘‘ओह…अच्छा माफ करो…’’ वह तिलमिलाती हुई बोली, ‘‘हट जाओ मेरे निदर्यी आशिक जी। बहुत तकलीफ हो रही है मुझे।’’
‘‘नहीं जानेमन।’’ उसके होंठों को चूमते हुए बोला अनिल, ‘‘अगर एक बार हटा, तो दोबारा तुम्हारी ‘कोठरी’ में प्रवेश नहीं कर पाऊंगा…क्योंकि जानता हूं घबराहट के मारे तुम मुझे दोबारा ऐसा करने ही नहीं दोगी।’’ वह प्यार करते हुए ही बोला, ‘‘अच्छा अब धीरे-धीरे आता हूं तुम्हारी कोठरी में..बस…’’

अब धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा अनिल। स्वाति भी आंखें बंद किये आनंद महसूस करने का प्रयास करने लगी। फिर कुछ ही क्षण बाद जब उसकी कोठरी में प्यार की थोड़ी बहुत बंूदा-बांदी हो गई, तो वह कुछ अच्छा महसूस करने लगी।
फिर धीरे-धीरे उसे इतना आनंद आने लगा, कि जो लड़की थोड़ी देर पहले बस-बस कर रही थी, वही अब और..और कर रही थी।
फिर देखते ही देखते दोनों ने रिश्तों की सारी मर्यादा भंग कर डाली।
उस दिन चाचा और भतीजी दोनों ही मर्यादा की सीमा को लांघ गये और उनके जिस्म एक-दूसरे में गंुथ गये। स्वाति को उसके चाचा अनिल ने जो शारीरिक सुख दिया, स्वाति उसमें बहती चली गई और फिर उसकी दीवानी ही हो गई थी।
अनिल अब स्वाति के लिए ही आता था। उसने स्वाति को मोटरसाइकिल के साथ-साथ रिवाॅल्वर चलानी भी सीखा दी। स्वाति अब पूरी तरह अनिल के प्यार के रंग मंे चुकी थी, जिसकी भनक न तो मां शैलजा को थी और न ही भाई नितिन को।
समय बीता और स्वाति ने 12वीं कक्षा पास कर ली। तब अनिल ने उसे बी.ए. में दाखिला लेने की सलाह देकर कहा, ‘‘भाभी स्वाति की पढ़ाई मंे जो भी खर्चा होगा, वो मैं पूरा करूंगा।’’
‘‘भाई साहब! वैसे भी आपके हम पर इतने एहसान हैं और अब स्वाति की पढ़ाई का खर्च झेल कर आप हमें और शर्मिंदा कर रहे हैं।’’ शैलजा ने कहा।
‘‘इसमें शर्मिन्दा करने की कोई बात नहीं है। क्या स्वाति से मेरा कोई संबंध नहीं है? या उस पर कोई हक नहीं है?’’
अनिल की ये बात सुनकर सामने खड़ी स्वाति उसकी तरफ शरारत भरी निगाहों से देखने लगी। अनिल भी कम नहीं था, उसने उसकी निगाहों का जवाब भी निगाहों से दिया।
आखिरकार स्वाति ने काॅलेज में दाखिला ले लिया। अनिल हर दिन उसे अपने साथ मोटरसाइकिल में ले जाता और छोड़ने आता था। स्वाति घर से काॅलेज की बात कहकर तो जाती, लेकिन अनिल की पनाहों में समा जाती थी।
अनिल और स्वाति की प्रेम कहानी जल्द ही आस-पड़ोस के लोगों के कानों तक पहुंच गई। जिसका परिणाम ये हुआ कि लोगों ने शैलजा और उसके परिवार का जीना दूभर कर दिया।
स्वाति को हर तरह से समझाया गया। एक दिन तो तब हद हो गई, जब पड़ोस के युवकों ने नितिन को भला-बुरा कहा और जब उसने भी बदले में पलटवार किया तो बहन के लक्षणों पर कीचड़ उछाल कर उसके ही मुंह पर थूक दिया।
पड़ोसी के उस बर्ताव से नितिन इतना अधिक आहत हो गया, कि उसने घर आकर स्वाति की बुरी तरह से पिटाई कर दी। इस दौरान बीच-बचाव करने के लिए कोई भी नहीं आया।
बड़े भाई के इस बर्ताव से स्वाति के मन में उसके लिए नफरत पैदा हो गई। उसने अनिल तक अपनी एक सहेली के हाथों खबर भिजवाई कि घरवालों को उनके प्यार के बारे में पता चल चुका है। इसलिए इन दिनों स्वाति घर पर ही नजर बंद कर दी गई है।
स्वाति ने अनिल को किसी भी तरह से आकर मिलने के लिए कहा था। अनिल घर के पीछे वाले रास्ते से रात के अंधेरे में स्वाति से मिलने के लिए पहुंच गया। स्वाति ने अनिल को सारी बात बताई और उससे कहा, ‘‘मैं नितिन को रास्ते से हटाना चाहती हूं, ताकि हमारे प्यार के बीच कोई बाधा न बन सके।’’
खूबसूरत जवान स्वाति के जिस्म को पाने की खातिर अनिल राजी हो गया। उसने स्वाति को अपने पास से उसी क्षण तमंचा निकाल के दिया और कारतूस भी स्वाति को सौंप दिया।
स्वाति चूंकि नितिन को मौत के घाट उतारने का फैसला कर चुकी थी, इसलिए उसे मौके की तलाश थी।
और फिर एक दिन उसे जब मौका मिल गया, तो आव देखा न ताव और अनैतिक संबंध में पागल हो चुकी एक बहन ने अपने ही सगे भाई को गोलियों से छलनी कर दिया। इसमें अनिल ने भी उसका भरपूर साथ दिया और नितिन की लाश को रात के अंधेरे में किसी सूनसान जगह पर जला कर राख कर दिया।

उन्होंने सोचा कि अब वह कभी भी पुलिस के शिकंजे में नहीं आयेंगे। मगर कानून की पैनी नजरों से दोनों नहीं बच पाये और कानून की गिरफ्त में आ ही गये।
पुलिस ने दोनों आरोपियों को अदालत में पेश कर न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया।
कहानी लेखक की कल्पना मात्र पर आधारित है व इस कहानी का किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है। अगर ऐसा होता है तो यह केवल संयोग मात्र हो सकता है।

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